तुलसी – स्तोत्रका वर्णन और महिमा पद्मपुराण पृष्ठ न. २०२

ब्राह्मणोंके पूछनेपर वेद व्यासजी ने तुलसी-स्तोत्रकी वर्णन
Last Updated on: November 2, 2025

यह  कथा पद्मपुराण से लिया गया है, जिसमे ब्राह्मणोंके पूछनेपर वेद व्यासजी ने तुलसी-स्तोत्रकी वर्णन और महिमा बताते हैं |

ब्राह्मणोने कहा – गुरुदेव ! हमने आपके मुखसे तुलसीके पत्र और पुष्पके सुभ माहात्म्य सुना, जो भगवान् श्री विष्णुको बहुत ही प्रिय है | अब हमलोग तुलसीके पुण्यमय स्तोत्रका श्रवण करना चाहते हैं | 

व्यासजी बोले – ब्राह्मणो ! पहले स्कंदपुराणमे मैं जो कुछ बतला आया हूँ, वही यहाँ कहता हूँ | शतानन्द मुनिके शिष्य कठोर व्रतका पालन करनेवाले थे | उन सबोंने एक दिन अपने गुरुको प्रणाम करके परम पुण्य और हितकी बात पूछी |  

शिष्योंने कहा – नाथ ! ब्रह्मवेत्ताओंमे श्रेष्ठ ! आपने पूर्वकालमें ब्रह्माजीके मुखसे तुलसीजीका जिस स्तोत्रका श्रवण किया था ,  उसको हम आपसे सुनना चाहत हैं | 

शतानंदजी बोले – शिष्यगण ! तुलसीका नामोच्चारण करनेपर असुरोंका दर्प दलन करनेवाले भगवान श्रीविष्णु प्रसन्न होते हैं | मनुष्यके पाप नष्ट हो जाते हैं तथा उसे अक्षय पुन्यकी प्राप्ति होती है |  जिसके दर्शनमात्रसे करोड़ों गोदानका फल होता है,  उस तुलसिका पूजन और वंदना लोग क्यों न करें | कलियुगके संसारमे वे मनुष्य धन्य हैं, जिनके घरमे शालग्राम – शीलका पुजन सम्पन्न करनेके लिए प्रतिदिन तुलसिका वृक्ष भूतलपर लहलहाता रहता है |  जो कलयुगमें भगवान् श्री केशवकी पूजाके लिए पृथ्वीपर तुलकसीका वृक्ष लगते है, उनपर यदि यमराज अपने किंकारोंसहित रुष्ट हो जाये टी भी वे उनका क्या कर सकते हैं |

तुलसी ! तुम अमृतसे उत्पन्न्न हो और केशवको सदा ही प्रिय हो |

कल्याणी ! मैं भगवानकी पूजाके लिए तुम्हारे पत्तोंको चुनता हूँ |

तुम मेरे लिए वरदायिनी बनो |

तुम्हारे श्रीअङ्गोंसे उत्पन्न होनेवाले पत्रों और मञ्जरियों द्वारा मै सदा ही जिस प्रकार श्री हरिका पूजन कर सकूँ, वैसा उपाय करो |

पवित्राङ्गी तुलसी ! तुम कलि-मलका नाश करनेवाली हो | इस भावके मन्त्रोंसे जो तुलसीदलोंको चुनकर उनसे भगवान् बासुदेवका पूजन करता है उसकी पूजाका करोड़ोंगुना फल होता है | 

देवेश्वरी ! बड़े-बड़े देवता भी तुम्हारे प्रभावका गायन करते हैं | मुनि, सिद्ध, गंधर्व, पाताल-निवासी साक्षात् नागराज शेष तथा सम्पूर्ण देवता भी तुम्हारे प्रभावको नहीं जानते; केवल भगवान् श्री विष्णु ही तुम्हारी महिमाको पूर्णरूपसे जानते हैं | जिस समय क्षीर-समुद्रके मन्थनका उद्योग प्रारम्भ हुआ था उस समय श्री विष्णुके आनन्दांशसे तुम्हारा प्रादुर्भाव हुआ था | पूर्वकालमें श्री हरिने तुम्हे अपने मस्तकपर धारण किया था |

देवी ! उस समय श्री विष्णुके शरीरका सम्पर्क पाकर तुम परम पवित्र हो गयी थी |

तुलसी ! मै तुम्हे प्रणाम करता हूँ | तुम्हारे श्रीअङ्गसे उत्पन्न पत्रोंद्वारा जिस प्रकार श्रीहरिका पूजा कर सकूँ, ऐसी कृपा करो,  सीससे मैं निर्विघ्नतापूर्वक परम गतिको प्राप्त होऊं | साक्षात् श्रीकृष्णने तुम्हे गोमतीतटपर लगाया और बढ़ाया था | वृन्दावनमे विचरते समय उन्होंने सम्पूर्ण जगत और गोपियोंके हितके लिए तुलसीका सेवन किया | 

जगतप्रिया तुलसी ! पूर्वकालमे वसिष्ठजीके कथानुसार श्री| रामचन्द्रजीने भी राक्षसोंका वध करनेके उद्देश्यसे सरयूके तटपर तुम्हे लगाया था |

तुलसीदेवी ! मै तुम्हे प्रणाम करता हूँ | श्री रामचंद्रजीसे वियोग हो जानेपर अशोकवाटिकामे रहते हुए जनककिशोरी सीताने तुम्हारा ही ध्यान किया था, जिससे उन्हें पूनः अपने प्रियतमका समागम प्राप्त हुवा | पूर्वकालमें हिमालय पर्वतपर भगवान् शंकरकी प्राप्तिके लिए पार्वतीदेवीने तुम्हे लगाया और अपने अभीष्ट-सिद्धिके लिए तुम्हारा सेवन किवा था 

तुलसीदेवी ! मैं तुम्हे नमस्कार करता हूँ | सम्पुर्ण देवांगनाओं और किन्नरोंने भी दुःस्वप्नका नाश करनेके लिए नन्दनवनमे तुम्हारा सेवन किया था |

देवी ! तुम्हे मेरा नमस्कार हैं | धर्मारण्य गयामे साक्षात् पितरोंने तुलसीका सेवन किया था | दण्डकारयण्यमें भगवन श्री रामचंद्रजीने अपने हित-साधनकी इच्छासे परम पवित्र तुलसीका वृक्ष लगाया तथा लक्ष्मण और सीताने भी बड़ी भक्तिके साथ उसे पोसा था |  जिस प्रकार शास्त्रोमें गंगाजीको त्रिभुवनव्यापिनी कहा गया है, उसी प्रकार तुलसीदेवी भी सम्पूर्ण चराचर जगतमे द्रिष्टिगोचर होती हैं | तुलसिका ग्रहण करके मनुष्य पातकोंसे मुक्त हो जाता है | और तो और, मुनीश्वरो ! तुलसीके सेवनसे ब्रह्महत्या भी दूर हो जाती है | तुलसीके पत्तेसे टपकता हुवा जल जो अपने सिरपर धारण करता है, उसे गंगा स्नान और दस गोदानका फल प्राप्त होता है |

देवी ! मुझपर प्रसन्न होओ |

देवेश्वरी ! हरिप्रिये ! मुझपर प्रसन्न हो जाओ | क्षीरसागरके मन्थनसे प्रकट हुई  तुलसीदेवी ! मै तुम्हे प्रणाम करता हूँ | 

द्वादशीकी रात्रिमे जागरण करके जो इस तुलसी-स्तोत्रका पाठ करता है, भगवान् श्रीविष्णु उसके बत्तीस अपराध क्षमा करते हैं | बाल्यावस्था, कुमारावस्था, जवानी और बुढापेमें जितने पाप किये होते हैं, वे सब तुलसी-स्तोत्रके पाठसे नष्ट हो जाते हैं | तुलसीके स्तोत्रसे संतुष्ट होकर भगवान् सुख और अभ्युदय प्रदान करते है | जिस घरमे तुलसीका स्तोत्र लिखा हुआ बिद्यमान रहता है, उसका कभी अशुभ नहीं होता, उसका सब कुछ मंगलमय होता है, किञ्चित भी अमंगल नहीं होता | उसके लिए सदा सुकाल रहता है | वह घर प्रचुर धन – धन्यसे भरा रहता है |

तुलसी – स्तोत्रक पाठ करनेवाले मनुष्यके हृदयमे भगवान् श्री विष्णुके प्रति अविचलित भक्ति होती है | तथा उसका वैष्णवोंमे कभी वियोग नहीं होता | इतना ही नहीं, उसकी बुद्धि कभी अधर्ममे नहीं प्रवत्त होती | जो द्वादशीकी रात्रिमे जागरण करके तुलसी-स्तोत्रका पाठ करता है, उसे करोड़ों तीर्थोंके सेवनका फल प्राप्त होता है | 

पद्मपुराण सृष्टिखण्ड पृष्ठ न. २०२ 

56 / 100 SEO Score
Author: SKU

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *