तुलसीकी वृक्ष और पत्ते की महिमा पद्मपुराण पृष्ठ न. २००

यह कथा पद्मपुराण से लिया गया है, जिसमे कार्तिकेयजी के पूछनेपर महादेव जी ने तुलसीकी वृक्ष और पत्ते की महिमा बताते हैं |
Last Updated on: November 2, 2025

कार्तिकेयजीने कहा: प्रभो ! रुद्राक्ष और आंवला इन दोनों फलोंकी पवित्रताको तो मै जान गया | अब मैं यह सुनना चाहता हूँ कि कौन सा ऐसा वृक्ष है जिसका पत्ता और फूल भी मोक्ष प्रदान करनेवाला है |

महादेवजी बोले: बेटा ! सब प्रकारके पत्तों और पुष्पोंकी अपेक्षा तुलसी ही श्रेष्ठ मानी गयी है | वह परम मङ्गलमयी, समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाली, सुद्ध, श्री विष्णुको अत्यंत प्रिय तथा वैष्णवी नाम धारण करनेवाली है | वह सम्पूर्ण लोकमे श्रेष्ठ, शुभ तथा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली है | भगवान् श्री विष्णुने पूर्वकालमें सम्पूर्ण लोकोका हित करनेके लिये तुलसीका वृक्ष रोपा था | तुलसीके पत्ते और पुष्प सब धर्मोंमे प्रतिष्ठित हैं | जैसे भगवान् श्री विष्णुको लक्ष्मी और मैं दोनों प्रिय हैं उसी प्रकार यह तुलसीदेवी भी परम प्रिय है | हम तीनके सिवा कोई चौथा ऐसा नहीं जान पड़ता जो भगवानको इतना प्रिय हो |

तुलसीदलके बिना दूसरे – दूसरे फूलो, पत्तो तथा चन्दन आदिके लेपोंसे भगवान श्री विष्णुको उतना संतोष नहीं होता | जिसने तुलसीदलके द्वारा पूर्ण श्राद्धके साथ प्रतिदिन भगवान श्री विष्णुका पूजन किया है, उसने दान, होम, यज्ञ, और व्रत आदि सब पूर्ण कर लिए |  तुलसीदलसे भगवान् की  पूजा कर लेलेपर कांति, सुख, भोगसामग्री, यश, लक्ष्मी, श्रेष्ठ कुल, शील, पत्नी, पुत्र, कन्या, धन, राज्य, आरोग्य, ज्ञान, विज्ञान, वेद, वेदांग, शास्त्र, पुराण, तंत्र और संहिता – सब कुछ में करतलगत समझता हूँ | जैसे पुण्यसलिला गंगा मुक्ति प्रदान करनेवाली हैं , उसी प्रकार यह तुलसी भी कल्याण करनेवाली हैं | 

स्कन्द ! यदि मञ्जरीयुक्त तुलसीपत्रोंके द्वारा भगवान् श्री विष्णुकी पूजा की जाय तो उसके पुण्य फलका वर्णन करना असंभव है | जहां तुलसीका वन है वहीँ भगवान् श्री कृष्णकी समीपता है | तथा वही ब्रह्मा और लक्ष्मीजी भी सम्पूर्ण देवताओंके साथ विराजमान हैं | इसीलिए अपने निकटवर्ती स्थानमें तुलसीदेवीको रोपकर उनकी पूजा करनी चाहिये | तुलसीके निकट जो स्तोत्र – मन्त्र आदिका जप किया जाता है वह सब अनंतगुना  फल देनेवाला होता है | 

प्रेत, पिशाच, कूष्माण्डा, ब्रह्मराक्षस, भूत और दैत्य आदि सब तुलसीके वृक्षसे दूर भागते हैं | ब्रह्महत्या आदि पाप तथा पाप और खोटे विचारसे उत्पन्न होनेवाले रोग – ये सब तुलसीवृक्षके समीप नस्ट हो जाते हैं | जिसने श्री भगवानकी पूजाके लिए पृथ्वीपर तुलसीका बगीचा लगा रखा है, उसने उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त सौ यज्ञोंका विधिवत अनुष्ठान पूर्ण कर लिया है | जो श्री भगवानकी प्रतिमाओं तथा शालग्राम – शिलाओंपर चढ़े हुए तुलसीदलको प्रसादके रूपमे ग्रहण करता है वह श्री विष्णुके सायुज्यको प्राप्त होता है | 

जो श्री हरिकी पूजा करके उन्हें निवेदन किये हुए तुलसीदलको अपने मस्तकपर धारण करता है, वह पापसे शुद्ध होकर स्वर्गलोकको प्राप्त होता है | कलियुगमें तुलसीका पूजन, कीर्तन, ध्यान, रोपण, और धारण करनेसे वह पापको जलाती और स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदान करती हैं | जो तुलसीके पूजन आदिका दूसरोंको उपदेश देता और स्वयं भी आचरण करता है वह भगवान श्री लक्ष्मीपतिके आराम धमको प्राप्ति होता है | जो वस्ति भगवान् श्री विष्णुको प्रिय जान पड़ती है, वह मुझे भी अत्त्यन्त प्रिय है | श्राद्ध और यज्ञ आदि कार्योमें तुलसी का एक पत्ता भी महान पुण्य प्रदान करनेवाला है | जिसने तुलसीकी सेवा की है, उसने गुरु, ब्राह्मण, देवता और तीर्थ – सबका भलीभांति सेवन कर लिया |

इसलिए षडानन | तुम तुलसीका सेवन करो | जो शिखामे तुलसी स्थापित करके प्राणोंका परित्याग करता है, वह पापराशीसे मुक्त हो जाता है | राजसूय आदि यज्ञ, भाँति – भाँतिके व्रत तथा संयमके द्वारा धीर पुरुष जिस गतिको प्राप्त करता है, वही उसे तुलसीकी सेवासे  मिल जाती है | तुलसीके एक पत्रसे  श्री हरिकी  पूजा करके मनुष्य वैष्णवत्वको प्राप्त होता है | उसके लिए अन्यान्य शास्त्रोंके विस्तारकी क्या आवश्यकता ही | जिसने तुलसीकी शाखा तथा कोमल पतियोंसे भगवान् श्री विष्णुकी पूजा की है, वह कभी माता का दूध नहीं पिता  –  उसका पुनर्जन्म नहीं होता |  कोमल तुलसीदलोंके द्वारा प्रतिदिन श्री हरिकी पूजा करके मनुष्य अपनी सैकड़ों और हजारो पीढ़ियोंको पवित्र कर सकता  है |

तात ! ये मैंने तुमसे तुलसीके प्रधान – प्रधान गुण बतलाये हैं | सम्पूर्ण गुणोंका वर्णन तो बहुत अधिक समय लगानेपर भी नहीं हो सकता | यह उपाख्यान पुण्यराशिका सञ्चय करनेवाला है | जो प्रतिदिन इसका श्रवण करता है , वह पूर्वजन्मके किये हुए पाप तथा जन्म – मृत्युके बन्धनसे मुक्त हो जाता है | बेटा ! इस अध्यायके पाठ करनेवाले पुरुषको कभी रोग नहीं सताते , अज्ञान उसके निकट नहीं आता | उसकी सदा विजय होती है | 

पद्मपुराण सृष्टिखण्ड पृष्ठ न. २००

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