सूर्यकी महिमा तथा अदितिके गर्भसे उनके अवतारका वर्णन ब्रह्मपुराण पृष्ट ६४

यह कथा ब्रह्मपुराण से लिया गया है, जिसमे मुनियों के पूछनेपर ब्रह्माजीने सूर्यकी महिमा तथा अदितिके गर्भसे उनके अवतारका वर्णन करते हैं |
Last Updated on: November 2, 2025

यह कथा ब्रह्मपुराण से लिया गया है, जिसमे मुनियों के पूछनेपर ब्रह्माजीने सूर्यकी महिमा तथा अदितिके गर्भसे उनके अवतारका वर्णन करते हैं |

ब्रह्माजी कहते हैं – भगवान् सूर्य सबके आत्मा, संपूर्ण लोकोंके ईश्वर, देवताओंके भी देवता और प्रजापति हैं | वे ही तीनों लोकोंकी जड़ हैं, परम देवता हैं | अग्निमें विधिपूर्वक डाली हुई आहुति सूर्यके पास ही पहुँचती है | सूर्यसे वृष्टि होती, वृस्ति से अन्न पैदा होता और अन्नसे प्रजा जीवन – निर्वाह करती है | क्षण, मुहूर्त, दिन, रात, पक्ष, मास, ऋतू और युग – इनकी काल – संख्या सूर्यके बिना नहीं हो सकती | काल का ज्ञान हुए बिना न कोई नियम चल सकता है और न अग्निहोत्र आदि ही हो सकते हैं | सूर्यके बिना ऋतुवोंका बिभाग भी नहीं होगा और उसके बिना बृक्षोंमें फल और फूल कैसे लग सकते हैं ? उस दशामें स्वर्गलोक तथा भूलोकमें जीवोंके व्योहारका भी लोप हो जायगा |

आदित्य, सविता, सूर्य, मिहिर, अर्क, प्रभाकर, मार्तण्ड, भास्कर, भानु , चित्रभानु, दिवाकर, तथा रवि – इन बारह सामान्य नामोंके द्वारा भगवान् सूर्यका ही बोध होता है | विष्णु, धाता, भग, पूषा, मित्र, इंद्र, वरुण, अर्यमा, विवस्वान, अंशुमान, त्वष्टा तथा पर्जन्य – ये बारह सूर्य पृथक-पृथक माने गए हैं | चैत्र मासमें विष्णु, वैशाखमें अर्यमा, जेष्ठमें विवस्वान, आषाढ़मे अंशुमान, श्रावणमे पर्जन्य, भादोंमें वरुण, आश्विनमे इंद्र कार्तिकमें धाता, अगहनमे मित्र, पौषमें पूषा, माघमे भग और फाल्गुनमे द्वष्टा नामक सूर्य तपते हैं | इस प्रकार यहाँ एक ही सूर्यके चौबीस नाम बताये गए हैं | इनके अतिरिक्त और भी हजारों नाम विस्तारपूर्वक कहे गए हैं |

मुनियोंने पूछा – प्रजापते ! जो एक हज़ार नामोंके द्वारा भगवान् सूर्यकी स्तुति करते हैं, उन्हें क्या पुण्य होता है? तथा उनकी कैसी गति होती है ?

ब्रह्माजी बोले – मुनिवरो ! मैं भगवान् सूर्यका कल्ल्याणमय सनातन स्तोत्र कहता हूँ, जो सब स्तुतियोंका सारभूत है | इसका पाठ करनेवालेको सहस्त्र नामोंकी आवस्यकता नहीं रह जाती | भगवान् भास्करके जो पवित्र सुबह एवं गोपनीय नाम हैं, उन्हीका वर्णन करता हूँ; सुनो | विकर्तन, विवस्वान, मार्तण्ड, भास्कर, रवि, लोकप्रकाशक, श्रीमान, लोकचक्षु, महेश्वर, लोकसाक्षी, त्रिलोकेश, करता, हर्ता, तमिस्रहा, तपन, तापन ,शुचि, सप्ताश्ववाहन, गभस्तिहस्त, ब्रह्मा और सर्वदेवनमस्कृत – इस प्रकार इक्कीस नामोंका यह स्तोत्र भगवान् सूर्यको सदा प्रिय है |

यह शरीरको निरोग बनानेवाला, धनकी वृद्धि करनेवाला और यश फैलानेवाला स्तोत्रराज है | इसकी तीनों लोकोंमें प्रसिद्धि है | द्विजवरो ! जो सूर्यके उदय और अस्तकालमें – दोनों सन्ध्याओंके समय इस स्तोत्रके द्वारा भगवान् सूर्यकी स्तुति करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है | भगवान् सूर्यके समीप एक बार भी इसका जप करनेसे मानसिक, वाचिक, शारीरिक तथा कर्मजनित सब पाप नष्ट हो जाते हैं |अतः ब्राह्मणो ! आप लोग यत्नपूर्वक सम्पूर्ण अभिलषित फलोंको देनेवाले भगवान् सूर्यका इस स्तोत्रके द्वारा स्तवन करें |

मुनियोंने पूछा – भगवन ! आपने भगवान् सूर्यको निर्गुण एवं सनातन देवता बतलाया है; फिर आपके ही मुंहसे हमने यह भी सुना है कि वे बारह स्वरूपोंमें प्रकट हुए | वे तेजकी राशि और महान तेजस्वी होकर किसी स्त्रीके गर्भमें कैसे प्रकट हुए, इस विषयमें हमें बड़ा संदेह है |

ब्रह्माजी बोले – प्रजापति दक्षके साठ कन्याएँ हुई, जो श्रेष्ठ और सुंदरी थीं | उनके नाम अदिति, दिति, दनु, बिनता, आदि थे | उनमेंसे तेरह कन्याओंका विवाह दक्षने कश्यपजीसे किया था | अदितिने तीनों लोकोंके स्वामी देवताओंको जन्म दिया | दितिसे दैत्य और दनुसे बलाभिमानी भयंकर दानव उत्पन्न हुए | विनता आदि अन्य स्त्रियोंने भी स्थावर – जङ्गम भूतोंको जन्म दिया | इन दक्षसुताओंके पुत्र, पौत्र और दौहित्र आधिके द्वारा यह सम्पूर्ण जगन व्याप्त हो गया |

कश्यपके पुत्रोंमें देवता प्रधान हैं, वे सात्विक हैं; इनके अतिरिक्त दैत्य आदि राजस और तामस हैं | देवताओंको यज्ञका भागी बनाया गया है | परंतु दैत्य और दानव उनसे शत्रुता रखते थे , अतः वे मिलकर उन्हें कष्ट पहुँचाने लगे | माता अदितिने देखा, दैत्यों और दानवोंने मेरे पुत्रोंको अपने स्थानसे हटा दिया और सारी त्रिलोकी नष्टप्राय कर दी | तब उन्होंने भगवान् सूर्यकी आराधनाके लिए महा प्रयत्न किया | वे नियमित आहार करके कठोर नियमका पालन कराती हुवी एकाग्रचित हो आकाशमें स्थित तेजोराशि भगवान् भास्करका स्तवन करने लगीं |

अदिति बोली – भगवन ! आप अत्यन्त सूक्ष्म, परम पवित्र और अनुपम तेज धारण करते हैं | तेजस्वियोंके ईश्वर, तेजके आधार तथा सनातन देवता हैं | आपको नमस्कार है | गोपते ! जगतका उपकार करनेके लिये मैं आपकी स्तुति – आपसे प्रार्थना कराती हूँ | प्रचंड रूप धारण करते समय आपकी जैसी आकृति होती है, उसको मैं प्रणाम करती हूँ | क्रमशः आठ मासतक पृथ्वीके जलरूप रसको ग्रहण करनेके लिए आप जिस अत्यंत तीव्र रूपको धारण करते हैं, उसे मैं प्रणाम करती हूँ | आपका वह स्वरुप अग्नि और सोमसे संयुक्त होता है | आप गुणत्माको नमस्कार है | विभावसो ! आपका जो रूप ऋक यजुष और सामकी ऐकतासे त्रयीसंज्ञक इस विश्वके रूपमें तपता है उसको नमस्कार है | सनातन ! उससे भी परे जो ॐ नामसे प्रतिपादित स्थूल एवं सूक्ष्मरूप निर्मल स्वरुप है, उसको मेरा प्रणाम है |

ब्रह्माजी कहते हैं – इस प्रकार बहुत दिनोंतक आराधना करनेपर भगवान् सूर्यने दक्षकन्या अदितिको अपने तेजोमय स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन कराया |

अदिति बोली – जगतके आदि कारण भगवान् सूर्य ! आप मुझपर प्रसन्न हों | गोपते ! मैं आपको भलीभांति देख नहीं पाती | दिवाकर ! आप ऐसी कृपा करें, जिससे मुझे आपके रूपका भलीभांति दर्शन हो सके | भक्तोंपर दया करनेवाले प्रभो ! मेरे पुत्र आपके भक्त हैं | आप उनपर कृपा करें | तब भगवान् भास्करने अपने सामने पड़ी हुई देवीको स्पष्ट दर्शन देकर कहा – देवि ! आपकी जो इच्छा हो उसके अनुसार मुझसे कोई एक वर माँग लें |

अदिति बोलीं – देव् ! आप प्रसन्न हों | अधिक बलवान दैत्यों और दानवोंने मेरे पुत्रोंके हाथसे त्रिलोकिका राज्य और यज्ञभाग छीन लिए हैं | गोपते ! उन्हीके लिए आप मेरे उपन कृपा करें | अपने अंशसे मेरे पुत्रोंके भाइ होकर आप उनके शत्रुओंका नाश करें |

भगवान् सूर्यने कहा – देवि ! मै अपने हजारवें अंशसे तुम्हारे गर्भका बालक होकर प्रकट होऊंगा और तुम्हारे पुत्रके शत्रुओंका नाश करूँगा | यो कहकर भगवान् भास्कर अंतर्धान हो गए और देवी अदिति भी अपना समस्त मनोरथ सिद्ध हो जानेके कारण तपस्यासे निवृत हो गयीं | तत्पश्चात वर्षके अन्तमे देवमाता अदितिकी इच्छा पूर्ण करनेके लिए भगवान् सविताने उनके गर्भमे निवास किया | उस समय देवी अदिति यह सोचकर की मैं पवित्रतापूर्वक ही इस दिव्य गर्भको धारण करुँगी, एकाग्रचित होकर कृच्छ्र और चान्द्रायण आदि व्रतोंका पालन करने लगीं |

उनका यह कठोर नियम देखकर कश्यपजीने कुछ कुपित होकर कहा – तू नित्य उपवास करके गर्भके बच्चेको क्यों मारे डालती है | तब वे भी रुष्ट होका बोलीं – देखिये यह रहा गर्भका बच्चा | मैंने इसे नहीं मारा है, यही अपने शत्रुओंका मारनेवाला होगा | यों कहकर देवमाताने उसी समय उस गर्भका प्रसव किया | वह उदयकालीन सूर्यके सामान तेजस्वी अंडाकार गर्भ सहसा प्रकाशित हो उठा |

उसे देखकर कश्यपजीने वैदिक वाणीके द्वारा आदरपूर्वक उसका स्तवन किया | स्तुति करनेपर उस गर्भसे बालक प्रकट हो गया | उसके श्रीअंगोकि आभा पद्मपत्रके समान श्याम थी | उसका तेज सम्पूर्ण दिशाओंमें व्याप्त हो गया | इसी समय अंतरिक्षसे कश्यपमुनिको सम्बोधित करके सजल मेघके समान गंभीर स्वरोंमे आकाशवाणी हुई – मुने ! तुमने अदितिसे कहा था – त्वया मारितम अन्डम (तूने गर्भके बच्चेको मार डाला) इसलिए तुम्हारा यह पुत्र मार्तण्ड के नामसे विख्यात होगा और यज्ञभागका अपहरण करनेवाले अपने शत्रुभूत असुरोंका संहार करेगा |

यह आकाशवाणी सुनकर देवताओंको बड़ा हर्ष हुवा और दानव हतोत्साह हो गए | तत्पश्चात देवताओंसहित इन्द्रने दैत्योंको युद्धके लिए ललकारा | दानवोंने भी आकर उनका सामना किया | उस समय देवताओं और असुरोंमें बड़ा भयानक युद्ध हुआ | उस युद्धमें भगवान् मार्तण्डने दैत्योंकी और देखा , अतः वे सभी महान असुर उनके तेजसे जलकर भस्म हो गए | फिर तो देवताओंके हर्षकी सीमा नहीं रही | उन्होंने अदिति और मार्तण्डका स्तवन किया | तदन्तर देवताओंको पूर्ववत अपने-अपने अधिकार और यज्ञभाग प्राप्त हूँ गये | भगवान् मार्तण्ड भी अपने अधिकारका पालन करने लगे | ऊपर और नीचे सब ओर किरणें फैली होनेसे भगवान् सूर्य कदंबपुष्पकी भांति शोभा पाते थे | वे आगमें तपाये हुए गोलेके सद्रश दिखायी देते थे | उनका विग्रह अधिक स्पष्ट नहीं जान पड़ता था |

ब्रह्मपुराण पृष्ट ६४

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