यह कथा पद्मपुराण से लिया गया है, जिसमे ब्राह्मणोंसे पूछेजानेपर बेद व्यासजी रुद्राक्षकी उत्पत्ति और महिमा के वारेमें बताते हैं |
ब्राह्मणोने पूछा – द्विजश्रेष्ठ ! इस मृत्यलोकमें कौन ऐसा मनुष्य है, जो पुण्यात्माओंमें श्रेष्ठ, परम पवित्र, सबके लिए सुलभ, मनुष्योंके द्वारा पूजन करने योग्य तथा मुनियों और तपस्वियोंका भी आदरपात्र हो ?
व्यासजी बोले – विप्रगण ! रुद्राक्षकी माला धारण करनेवाला पुरुष सब प्राणियोंमें श्रेष्ठ है | उसके दर्शनमात्रसे लोगोकी पाप-राशि विलीन हो जाती है | रुद्राक्षके स्पर्शसे मनुष्य स्वर्गका सुख भोगता है और उसे धारण करनेसे वह मोक्षको प्राप्त होता है | जो मस्तकपर तथा हृदय और बांहमें भी रुद्राक्ष धारण करता है वह इस संसारमे साक्षात्त भगवान् शंकरके सामान है |
रुद्राक्षधारी ब्राम्हण जहां रहता है, वह देश पुण्यवान होता है | रुद्राक्षका फल तीर्थोंमें महान तीर्थके समान है | ब्रम्ह-ग्रन्थिसे युक्त मंगलमयी रुद्राक्षकी माला लेकर जो जप-दान-स्तोत्र, मंत्र और देवताओंका पूजन तथा दूसरा कोई पुण्य कर्म करता है, वह सब अक्षय हो जाता है तथा उससे पापोंका क्षय होता है |
श्रेष्ठ द्विजगण ! अब मई मलका लक्षण बतलाता हूँ, सुनो | उसका लक्षण जानकर तुमलोग मोक्ष-मार्ग प्राप्त कर लोगे | जिस रुद्राक्षमे योनिका चिन्ह न हो, जिसमे कीड़ोंने छेद कर दिया हो, जिसका लिंगचिन्ह मिट गया हो तथा जिसमे दो बीज एक साथ सटे हुए हो, ऐसे रुद्राक्षके दानेको मालामे नहीं लेना चाहिये | जो माला अपने हाथसे गुंथी हुई और ढीली-ढाली हो, जिसके दाने एक-दुसरेसे सटे हुए हो अथवा सूद्र आदि नीच मनुष्योंने जिसे गुंथा हो – ऐसी माला असुध्द होती है | उसका दूरसे ही परित्याग कर देना चाहिये | जो सर्पके समान आकारवाली (एक औरसे बड़ी और क्रमशः छोटी), नक्षत्रोंकी-सी शोभा धारण करनेवाली, सुमेरुसे युक्त तथा सटी हुई ग्रंथिके कारण सुद्ध है वही माला उत्तम मणि गयी है |
विद्वान पुरुषको वैसी ही मालापर जप करना चाहिये | उपर्युक्त लक्षणोंसे सुद्ध रुद्राक्षकी माला हाथमे लेकर मध्यमा अंगुलीसे लगे हुए दानोको क्रमसः अंगूठेसे सरकाते हुए जप करना चाहिये | मेरुके पास पहुंचनेपर मालको हाथसे बार-बार घुमा लेना चाहिये-मेरुका उलंघन करना उचित नहीं है | वैदिक, पौराणिक तथा आगमोक्त जितने भी मन्त्र है, सब रुद्राक्षमालापर जप करनेसे अभीष्ट फलके उत्पादक और मोक्षदायक होते हैं | जो रुद्राक्षमालासे चुते हुए जलको मस्तकपर धारण करता है, वह सब पापोंसे सुद्ध होकर अक्षय पुण्यका भागी होता है | रुद्राक्षमालाका एक-एक बीज एक-एक देवताके समान है | जो मनुष्य अपने शरीरमे रुद्राक्ष धारण करता है वह देवताओंमे श्रेष्ठ श्रेष्ठ होता है |
ब्राम्हणोने पूछा – गुरुदेव ! रुद्राक्षकी उत्पत्ति कहांसे हुई है? तथा वह इतना पवित्र कैसे हुआ ?
व्यासजी बोले – ब्राम्हणो ! पहले किसी सत्ययुगमे एक त्रिपुर नामक दानव रहता था, वह देवताओंका वध करके अपने अंतरिक्षचारी नगरमे छिप जाता था | ब्रम्हाजीके वरदानसे प्रबल होकर वह संपूर्ण लोकोंके विनाशकी चेष्टा कर रहा था | एक समय देवताओंके निवेदन करनेपर भगवान् शङ्करने यह भयंकर समाचार सुना | सुनते ही उन्होने अपने आजगव नामक धनुषपर विकराल बाण चढ़ाया और उस दानवको दिव्य द्रिष्टिसे देखकर मार डाला | दानव आकाशसे टूटकर गिरनेवाली बहुत बड़ी लुकाके समान इस पृथ्वीपर गिरा | इस कार्यमे अत्यन्त श्रम होनेके कारण रुद्रदेवके शरीरसे पसीनेकी बुँदे टपकने लगी |
उन बूंदोंसे तुरंत ही पृथ्वीपर रुद्राक्षका महान वृक्ष प्रकट हुआ | इसका फल अत्यंत गुप्त होनेके कारन साधारण जीव उसे नहीं जानते | तदन्तर एक दिन कैलासके शिखरपर विराजमान हुए देवाधिदेव भगवान् शंकरको प्रणाम करके कार्तिकेयजीने कहा-तात (पिता जी) ! मै रुद्राक्षका यथार्थ फल जानना चाहता हूँ | उसपर जप करने तथा उसका धारण, दर्शन अथवा स्पर्श करनेसे क्या फल मिलता है ?
भगवान् शिवने कहा – रुद्राक्षके धारण करनेसे मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे छूट जाता है | यदि कोई हिंसक पशु भी कंठमे रुद्राक्ष धारण करके मर जाये तो रुद्रस्वरूप हो जाता है, फिर मनुष्य आदिके लिए तो कहना ही क्या है | जो मनुष्य मस्तक और हृदयमें रुद्राक्षकी माला धारण करके चलता है, उसे पग-पगपर अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है | जो कितने भी मुखवाले रुद्राक्षको धारण करता है, वह मेरे समान होता है; इसलिए पुत्र ! तुम पूरा प्रयत्न करके रुद्राक्ष धारण करो |
जो रुद्राक्ष धारण करके इस भूतलपर प्राण-त्याग करता है; वह सब देवताओंसे पूजित हकार मेरे रमणीय धामको जाता है | जो मृत्युकालमे मस्तकपर एक रुद्राक्षकी माला धारण करता है, वह शैव, वैष्णव, शाक्त, गणेशोपासक और सूर्योपासक सब कुछ है | जो इस प्रसङ्गको पढता-पढ़ाता, सुनता और सुनाता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर सुखपूर्वक मोक्ष-लाभ करता है |
पद्मपुराण सृष्टिखण्ड पृष्ठ न. १९६

