यह कथा वराह पुराण से ली गई है, जिसमें भगवान वराह ने पृथ्वी देवि के पूछने पर उन बत्तीस अपराधों का विस्तार से वर्णन किया है, जिन्हें भगवान की सेवा में टाला जाना चाहिए।
भगवान् वराह कहते हैं – भद्रे | आहारकी एक सुनिश्चित शास्त्रीय मर्यादा है | अतः मनुष्यको क्या खाना चाहिए और क्या नहीं खाना चाहिये, अब यह बताता हूँ, सुनो | माधवि ! जो भोजनके लिए उद्यत पुरुष मुझे अर्पित करके भोजन करता है, उसने अशुभ कर्म ही क्यों न किये हों, फिर भी वह धर्मात्मा ही समझा जाने योग्य है | धर्मके जाननेवाले पुरुषको प्रतिदिन धान, यव आदि – सब प्रकारके साधनमें सहायक (जीवनरक्षणीय ) अन्नसे निर्मित आहारका ही सेवन करना चाहिये | अब जो साधनमें बाधक हैं, तुम्हे उन्हें बताता हूँ |
१. जो मुझे अपवित्र वस्तुएँ भी निवेदन करके खाता है, वह धर्म एवं मुक्ति परम्पराके विरुद्ध महान अपराध करता है, चाहे वह महान तेजस्वी ही क्यों न हो, यह मेरा पहला भगवत अपराध है |
२. अपराधीका अन्न मुझे बिलकुल नहीं रुचता हैं | जो दूसरेका अन्न खाकर मेरी सेवा या उपासना करता है, यह दूसरा अपराध है |
३. जो मनुष्य स्त्री – संग करके मेरा स्पर्श करता है, उसके द्वारा होनेवाला यह तृतीय कोटिका सेवापराध है इससे धर्ममे बाधा पड़ती है |
४. बसुंधरे ! जो रजस्वला नारीको देखकर मेरी पूजा करता है, मै इसे चौथा अपराध मानता हूँ |
५. जो मृतकका स्पर्श करके अपने शरीरको सुद्ध नहीं करता और अपवित्रावस्थामें ही मेरी सपर्यामे लग जाता है, यह पांचवां अपराध है, जिसे मैं क्षमा नहीं करता |
६. बसुंधरे ! मृतकको देखकर बिना आचमन किये मेरा स्पर्श करना छठा अपराध है |
७. पृथ्वी ! यदि उपासक मेरी पूजाके बीचमे ही शौचके लिये चला जाय तो यह मेरी सेवका सातवां अपराध है |
८. बसुंधरे ! जो नीले वस्त्रसे आवृत होकर मेरी सेवामें उपस्थित होता है, यह उसके द्वारा आचरित होनेवाला आठवां सेवा – अपराध है |
९. जगतको धारण करनेवाली पृथ्वी ! जो मेरी पूजाके समय अनुचित – अनर्गल बातें कहता है, यह मेरी सेवाका नवां अपराध है |
१०. बसुंधरे ! जो शास्त्रविरुद्ध वस्तुका स्पर्श करके मुझे पानेके लिए प्रयत्नशील रहता है, उसका यह आचरण दशवाँ अपराध माना जाता है |
११. जो व्यक्ति क्रोधमें आकर मेरी उपासना करता है, यह मेरी सेवाका ग्यारहवाँ अपराध है, इससे मैं अत्यंत अप्रसन्न होता हूँ |
१२. बसुंधरे ! जो निषिद्ध कर्मोंको पवित्र मानकर मुझे निवेदित करता है, वह बारहवाँ अपराध है |
१३. जो लाल वस्त्र या कौसुम्भ रंगके (वनकुसुमसे रँगे) वस्त्र पहनकर मेरी सेवा करता है, वह तेरहवाँ सेवा – अपराध है |
१४. धरे ! जो अंधकारमें मेरा स्पर्श करता है, उसे मैं चौदहवाँ सेवा अपराध मानता हूँ |
१५. बसुंधरे ! जो मनुष्य काले वस्त्र धारणकर मेरे कर्मोंको संपादन करता है, वह पन्द्रहवाँ अपराध करता है |
१६. जगद्धात्री ! जो बिना धोती पहने हुए मेरी उपचर्यामें संलग्न होता है, उसके द्वारा आचरित इस अपराधको मैं सोलहवाँ मानता हूँ |
१७. माधवि ! अज्ञानवश जो स्वयं पकाकर बिना मुझे अर्पण किये खा लेता हैं, यह सत्तरहवाँ अपराध है |
१८. वशुंधरे ! जो अभक्ष्य (मत्स्य – मांस ) भक्षण करके मेरी शरणमें आता है, उसके इस आचरणको मैं अठारहवाँ सेवापराध मानता हूँ |
१९. वशुंधरे ! जो जालपाद (बतख ) – का मांस भक्षण करके मेरे पास आता है, उसका यह कर्म मेरी द्रिष्टीमें उन्नीसवां अपराध है |
२०. जो दीपकका स्पर्श करके बिना हाथ धोये ही मेरी उपासनामें संलग्न हो जाता है, जगद्धात्री ! उसका वह कर्म मेरी सेवाका बिसवां अपराध हैं |
२१. वरानने ! जो श्मशानभूमिमें जाकर बिना शुद्ध हुए मेरी सेवामें उपस्थित हो जाता है, वह मेरी सेवाका इक्कीसवाँ अपराध है |
२२. वसुंधरे ! बाईसवाँ अपराध वह है, जो पिण्याक (हींग) – भक्षण कर मेरी उपासनामें उपस्थित होता है |
२३. देवी ! जो सूअर आदिके मांसको प्राप्त करनेका यत्न करता है, उसके इस कार्यका मैं तेईसवाँ अपराध मानता हूँ |
२४. जो मनुष्य मदिरा पीकर मेरी सेवामें उपस्थित होता है, वसुंधरे ! मेरी द्रिष्टीमें यह चौबीसवाँ अपराध है |
२५. जो कुसुम्भ (करमी ) -का शाक खाकर मेरे पास आता है, देवि ! वह मेरी सेवाका पचीसवाँ अपराध है |
२६. पृथ्वी ! जो दुसरेके वस्त्र पहनकर मेरी सेवामें उपस्थित होता है, उसके उस कर्मको मैं छब्बीसवाँ अपराध मानता हूँ |
२७. वसुंधरे ! सेवापराधोंमे सत्ताईसवाँ अपराध वह है, जो नया अन्न उत्पन्न होनेपर उसके द्वारा देवताओं और पितरोंका यजन न कर उसे स्वयं खा लेता है |
२८. देवि ! जो व्यक्ति जूता पहनकर किसी जलाशय या बावलीपर चला जाता है, उसके इस कार्यको मैं अठ्ठाईसवाँ अपराध मानता हूँ |
२९. गुणशालिनी ! शरीरमें उबटन (सरसों, तिल आदि का लेप) लगाकर जो बिना स्नान किये मेरे पास चला आता है, यह उन्तीसवाँ सेवा अपराध है |
३०. जो पुरुष अजीर्णसे ग्रस्त होकर मेरे पास आता है , उसका यह कार्य मेरी सेवका तीसवाँ अपराध है |
३१. यशस्विनि ! जो पुरुष मुझे चन्दन और पुष्प अर्पण किये बिना पहले धुप देनेमें तत्पर हो जाता है, उसके इस अपराधको मै इकतीसवां मानता हूँ |
३२. मनस्विनी ! भेरी आदिद्वारा मङ्गलसब्द किये बिना ही मेरे मंदिरके फाटकको खोलना बत्तीसवाँ अपराध है | देवि ! इस बत्तीसवें अपराधको महापराध समझना चाहिये |
बराह पुराण पृष्ट १८०

