आँवला की फल की महिमा पद्मपुराण पृष्ठ न. १९८

आँवले की फल की महिमा
Last Updated on: September 23, 2025

कार्तिकेयजीने कहा: जगदीश्वर ! मै अन्यान्य फलोंकी पवित्रता के विषयमे भी प्रश्न कर रहा हूँ | सब लोगोके हितके लिए यह वतलाइये की कौन-कौन-से फल उत्तम हैं |

ईश्वरने (शंकरने) कहा: बेटा ! आँवलेका फल समस्त लोकोमे प्रसिद्ध और परम पवित्र है | उसे लगानेपर स्त्री और पुरुष सभी जन्म – मृत्युके बन्धन से मुक्त हो जाते हैं | यह पवित्र फल भगवान् श्री विष्णुको प्रसन्न करनेवाला एवं शुभ माना गया हैं, इसके भक्षणमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाते हैं | आंवला खानेसे आयु बढ़ती है, उसका जल पीनेसे धर्म-संचय होता है और उसके द्वारा स्नान करनेसे दरिद्रता दूर होती है तथा सब प्रकारके ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं |

कार्तिकेय ! जिस घरमे आँवला सदा मौजूद रहता है, वहाँ दैत्य और राक्षस नहीं जाते | एकादशीके दिन यदि एक ही आंवला मिल जाय तो उसके सामने गंगा, गया, कशी, और पुष्कर आदि तीर्थ कोई विशेष महत्व नहीं रखते | जो दोनों पक्षोकि एकादशीको आंवलेसे स्नान करता है, उसके सब पाप नस्ट होजाते हैं और वह श्री विष्णुलोकमें सम्मानित होता है |

षडानन ! जो आंवलेके रससे सदा अपने केश साफ करता करता है, वह पुन: माताके स्तनका दूध नहीं पिता | आंवलेका दर्शन, स्पर्श तथा उसके नामका उच्चारण करनेसे संतुष्ट होकर वरदायक भगवान् श्री विष्णु अनुकूल हो जाते हैं |

जहाँ आंवले का फल मौजूद होता है, वहां भगवान् श्री विष्णु सदा विराजमान रहते हैं तथा उस घरमे ब्रह्मा एवं सुस्थिर लक्ष्मीका भी वाश होता है | इसलिए अपने घरमे आंवला अवस्य रखना चाहिये | जो आंवलेका बना मुरब्बा एवं बहुमूल्य नैबेद्य अर्पण करता है, उसके ऊपर भगवान् श्रीविष्णु बहुत संतुष्ट होते हैं | उतना संतोष उन्हें सैकड़ो यज्ञ करनेपर भी नहीं हो सकता |

स्कन्द | योगी, मुनियो तथा ज्ञानियोका जो गति प्राप्ति होती है, वही आंवलेका सेवन करनेवाले मनुस्यको भी मिलती है | तीर्थोंमें वास एवं तीर्थ-यात्रा करनेसे तथा नाना प्रकारके व्रतोंसे मनुष्यको जो गति प्राप्त होती है वही आंवलेके फलका सेवन करनेसे भी मिल जाती है |

तात ! प्रत्येक रविवार तथा विशेषतः सप्तमी तिथिको आंवलेका फल दूरसे ही त्याग देना चाहिए | संक्रांतिके दिन, शुक्रवारको तथा षष्ठी, प्रतिपदा, नवमी और अमावस्याको आंवालेका दूरसे ही परित्याग करना उचित है |

जिस मृतकके मुख, नाक, कान अथवा बालोमे आंवालेका फल हो, वह विष्णुलोकको जाता है | आंवालेके सम्पर्कमात्रसे मृत व्यक्ति भगवद्धामको प्राप्त होता है | जो धार्मिक मनुष्य शरीरमे आंवालेका राश लगाकर स्नान करता है उसे पद-पदपर अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है | उसके दर्शन मात्रसे जितने भी पापी जंतु है, वे भाग जाते हैं तथा कठोर एवं दुस्ट ग्रह पलायन कर जाते हैं |

स्कन्द ! पूर्वकालकि बात हैं-एक चाण्डाल शिकार खेलनेके लिए वनमे गया | वहां अनेको मृगों और पक्षियोंको मारकर जब वह भूख-प्याससे अत्यंत पीड़ित हो गया, तब सामने ही उसे एक आंवालेका वृक्ष दिखाई दिया | उसमे खूब मोटे-मोटे फल लगे थें | चांडाल सहसा वृक्षके ऊपर चढ़ गया और उसके उत्तम-उत्तम फल खाने लगा | प्रारब्धवश वह वृक्षके शिखरसे पृथ्वीपर गिर पड़ा और वेदनासे ब्यथित होकर इस लोकसे चल बसा |

तदन्तर सम्पूर्ण प्रेत, राक्षस, भूतगण तथा यमराजके सेवक बड़ी प्रसन्नतासे साथ वहां आये; किन्तु उसे ले न जा सके | यद्दपि वे महान बलवान थे तथापि उस मृतक चाण्डालकी और आँख उठाकर देख भी नहीं सकते थे | जब कोई भी पकड़कर ले जा जा न सका, तब वे अपनी असमर्थता देख मुनियोए के पास जाकर बोले – ज्ञानी महर्षियो ! चांडाल तो बड़ा पापी था; फिर क्या कारण है की हमलोग तथा ये यमराजके सेवक उसकी और देख भी न सके? यह मेरा है, यह मेरा है कहते हुए हमलोग झगड़ा कर रहे हैं, किन्तु उसे ले जानेकी शक्ति नहीं रखते | क्यों और किसके प्रभावसे वह सूर्यकी भांति दुष्प्रेक्ष्य हो रहा है – उसकी और द्रस्तिपात करना भी कठिन जान पड़ता हैं |

मुनियोंने कहा: प्रेतगण ! इस चांडालने आंवालेका पके हुए फल खाये थे | उसीका डाल टूट जानेसे उसके सम्पर्कमे ही मृत्यु हुई है | मृत्युकालमे भी इसके आस-पास बहुत से फल बिखरे पड़े थे | इन्ही सब कारणोंसे तुमलोगोंका इसकी और देखना कठिन हो रहा है | इस पापीका आंवलेसे संपर्क रविवारको या और किसी निषिद्ध वेलामे नहीं हुआ है; इसलिए यह दिव्य लोकको प्राप्त होगा |

प्रेत बोले: मुनीश्वरो ! आपलोगोंका ज्ञान उत्तम है, इसलिए हम आपसे एक प्रश्न पूछते हैं | जबतक यहाँ श्री विष्णुलोकसे विमान नहीं अत, तबतक आपलोग हमारे प्रश्नका उत्तर दे दें | जहाँ वेदों और नाना प्रकारके मन्त्रोंका गंभीर घोष होता है, जहा पुराणों और स्मर्तियोका स्वाघ्याय किया जाता है, वहां हम एक क्षणके लिए भी नहीं ठहर सकते | यज्ञ, होम, जप, तथा देवपूजा आदि शुभ कार्योंके सामने हमारा ठहरना असंभव है; इसलिए हमें यह बताइये की कौन-सा कर्म करके मनुष्य प्रेतयोनियोंकी प्राप्त होते हैं | हमें यह सुननेकी भी इच्छा है की उनका शरीर विकृत क्योंकर हो जाता है |

ब्रह्मर्षियोंने कहा: जो झूठी गवाही देते तथा वध और बन्धनमे पढ़कर मृत्युको प्राप्त होते हैं , वे नरकमें पड़े हुए जीव ही प्रेत होते हैं | जो ब्राह्मणोंके दोष ढूँढ़नेमे लगे रहते हैं और गुरुजनोंके सुभ कर्मोंमें बाधा पहुंचाते हैं तथा जो श्रेष्ठ ब्राह्मणको दिए जानेवाले दानमे रुकावट डाल देते हैं, वे चिरकालतक प्रेतयोनिमे पढ़कर नरकसे कभी उद्धार नहीं पाते | जो मुर्ख अपने और दुसरेके बैलोंको कस्ट दे उनसे बोझ ढ़ोनेका काम लेकर उनकी रक्षा नहीं करते, जो अपनी प्रतिज्ञाका त्याग करते असत्य बोलते और व्रत भङ्ग करते हैं तथा जो कमलके पत्तेपर भोजन करते हैं, वे सब इस पृथ्वीपर कर्मानुसार प्रेत होते हैं | जो अपने चाचा और मामा आदिकी सदाचारिणी कन्या तथा साध्वी स्त्रीको बेच देते हैं, वे भूतलपर प्रेत होते हैं |

प्रेतोंने पूछा: ब्राह्मणो ! किस प्रकार और किस कर्मके आचरणसे मनुष्य प्रेत नहीं होते ?

ब्राह्मणोंने कहा: जिस बुद्धिमान पुरुषने तीर्थोके जलमे स्नान तथा शिवको नमस्कार किया है, वह मनुष्य प्रेत नहीं होता | जो एकादशी अथवा द्वादशीको उपवास करके विशेषतः भगवान् श्री विष्णुका पूजन करते हैं तथा जो वेदोंके अक्षर , सुक्त , स्तोत्र , और मंत्र आदिके द्वारा देवताओंके पूजनमे संलघ्न रहते हैं, उन्हें भी प्रेत नहीं होना पड़ता | पुराणोंके धर्मयुक्त दिव्य वचन सुनने, पढ़ने और पढानेसे तथा नाना प्रकारके व्रतोंका अनुष्ठान करने और रुद्राक्ष धारण करनेसे जो पवित्र हो चुके हैं एवं जो रुद्राक्षकी मालपर जप करते हैं, वे प्रेतयोनिके नहीं प्राप्त होते | जो आंवालेके फलके रससे स्नान करके प्रतिदिन आंवला खाया करते हैं तथा आंवलेके द्वारा भगवान् श्री विष्णुका पूजन भी करते हैं , वे कभी पिचाशयोनिमे नहीं जाते |

प्रेत बोले: महर्षियो ! संतोके दर्शनसे पुण्य होता है-इस बातको पौराणिक विद्वान जानते हैं | हमें भी आपका दर्शन हुआ है; इसलिये आपलोग हमारा कल्याण करें | धीर महात्माओ ! जिस उपायसे हम सब लोगोको प्रेतयोनिसे छुटकारा मिले, उसका उपदेश कीजिये | हम आपलोगोकि शरण में आये हैं |

ब्राम्हण बोले: हमारे वचनसे तुमलोग आंवालेका भक्षण कर सकते हो | वह तुम्हारे लिए कल्याणकारक होगा | उसके प्रभावसे तुम उत्तम लोकमे जानेके योग्य बन जाओगे |

महादेवजी कहते हैं: इस प्रकार ऋषियोंसे सुनकर पिशाच आंवालेके वृक्षपर चढ़ गए और उसका फल ले – लेकर उन्होंने बड़ी मौजके साथ खाया | तब देवलोकसे तुरंत ही एक पिले रंगका सुवर्णमय विमान उतरा, जो परम शोभायमान थान | पिशाचोने उसपर आरूढ़ होकर स्वर्गलोककी यात्रा की | बेटा | अनेक व्रतों और यज्ञोंके अनुष्ठानसे भी जो अत्यंत दुर्लभ है, वही लोक उन्हें आंवले का भक्षण करने मात्रसे मिल गया |

कार्तिकेयजीने पूछा: पिताजी ! जब आंवालेके फलका भक्षण करने मात्रसे प्रेत पुण्यात्मा होकर स्वर्गको चले गए, तब मनुष्य आदि जितने प्राणी हैं, वे भी आंवला खानेसे क्यों नहीं तुरंत स्वर्गमे चले जाते ?

महादेवजीने कहा: बेटा ! स्वर्गकी प्राप्ति तो उन्हें भी होती है; किन्तु तुरंत ऐसा न होनेमे एक कारण है – उनका ज्ञान लुप्त रहता है, वे अपने हित और अहितकी बात नहीं जानते | इसलिए आंवलेके महत्त्वमे उनकी श्रद्धा नहीं होती |

जिस घरकी मालकिन सहज ही काबूमें न आनेवाली, पवित्रता और संयमसे रहित, गुरुजनोद्वारा निकली हुई तथा दुराचीरिणी होती है, वहां प्रेत रहा करते हैं | जो कुल और जातिसे नीच, बल और उत्साहसे रहित, बहरे, दुर्बल और दीन है, वे कर्मजनित पिशाच है | जो माता, पिता, गुरु और देवताओंकी निंदा करते हैं, पाखंडी और वाममार्गी है, जो गलेमे फांसी लगाकर, पानिमे डूबकर, तलवार या छुरा भोंककर अथवा जहर खाकर आत्मघात कर लेते हैं, वे प्रेत होनेके पश्चात इस लोक में चांडाल आदि योनियोके भीतर जन्म ग्रहण करते हैं | जो माता – पिता आदिसे द्रोह करते, ध्यान और अध्ययनसे दूर रहते हैं, व्रत और देवपूजा नहीं करते, मन्त्र और स्नानसे हिन् रहकर, गुरूपत्नी गमनमे प्रवृत होते हैं तथा जो दुर्गतिमे पड़ी हुई चांडाल आदिकी स्त्रियोसे समागम करते है, वे भी प्रेत होते हैं |

मलेच्छोंके सामान आचरण करते और स्त्रीके धनसे जीविका चलाते हैं, जिनके द्वारा स्त्रियोंकी रक्षा नहीं होती, वे नि:संदेह प्रेत होते हैं | जो क्षुधासे पीड़ित, थके-मांदे, गुणवान और पुण्यात्मा अतिथिके रूपमे घरपर आये हुये ब्राम्हणको लौटा देते हैं – उसका यथावत सत्कार नहीं करते, जो गो-भक्षी मलेच्छोंके हाथ गौएँ बेच देते हैं, जो जीवनभर स्नान, संध्या, बेद-पाठ, यज्ञानुष्ठान और अक्षरज्ञानसे दूर रहते है, जो लोग जूठे शकोरे आदि और शरीरके मल-मूत्र तीर्थ – भूमिमे गिराते हैं वे निःसंदेह प्रेत होते हैं |

जो स्त्रियाँ पतिका परित्याग करके दूसरे लोगोंके साथ रहती हैं, वे चिरकालतक प्रेतलोकमे निवास करनेके पश्चात चांडालयोनिमे जन्म लेती हैं | जो विषय और इन्द्रियोंसे मोहित होकर पतिको धोका देकर स्वयं मिठाइयां उड़ाती हैं वे पापाचारिणी स्त्रियाँ चिरकालतक इस पृथ्वीपर प्रेत होती हैं | जो मनुष्य बलपुर्वक दुसरेकी वस्तुएं लेकर उन्हें अपने अधिकारमे कर लेते हैं और अतिथियोंका अनादर करते हैं, वे प्रेत होकर नरकमें पड़े रहते हैं |

इसलिए जो आंवला खाकर उसके रससे स्नान करते हैं, वे सब पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होते हैं | अतः सब प्रकारसे प्रयत्न करके तुम आंवलेके कल्याणमय फलका सेवन करो | जो इस पवित्र और मंगलमय उपाख्यानका प्रतिदिन श्रवण करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे शुद्ध होकर भगवान् श्री विष्णुके लोकमे सम्मानित होता हैं | जो सदा ही लोगोमे विशेषतः वैष्णवोंमें आंवलेके माहात्म्यका श्रवण करता है, वह भगवान श्री विष्णुके सायुज्यको प्राप्त होता हैं ऐसा पौरणिकोंका कथन हैं |

पद्मपुराण सृष्टिखण्ड पृष्ठ न. १९८

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